
रीवा संभाग में ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के कार्यपालन यंत्री टीपी गुर्दवान के एक वायरल वीडियो ने पूरे प्रशासनिक सिस्टम को झकझोर कर रख दिया है। यह कोई आरोप नहीं, खुद उनका कबूलनामा है — जिसमें स्वीकार कर रहे हैं कि उन्होंने एक उपयंत्री को भ्रष्टाचार के मामलों से कैसे बचाया। वीडियो में गुर्दवान कहते सुने जा सकते हैं — “मैंने उपयंत्री अनित राज सिंह को बचाया। बैक डेट में सीसी, एमबी के प्रतिवेदन बनाए। सस्पेंड होने से बचाया। मैं नहीं चाहता था मेरी कलम से किसी की नौकरी चली जाए…” 1 मिनट 41 सेकंड की इस क्लिप में गुर्दवान मानो अपनी ईमानदारी नहीं, बल्कि घोटालों की जड़े खुद उधेड़ रहे हों।
सवालों के घेरे में प्रशासन: क्या सब कुछ ‘मैनेज’ था?
यह कोई सामान्य बयान नहीं — यह उस प्रशासनिक लाचारी की एक मिसाल है, जहाँ एक जिम्मेदार अधिकारी खुद कह रहा है कि उसने नियमों को तोड़कर जांच रिपोर्ट बदली, बैक डेट में कागजात बनाए, और दोषियों को बचाया। अब सवाल ये उठता है कि जब यह खुल्लमखुल्ला स्वीकार हो रहा है, तो कार्रवाई क्यों नहीं? क्या रीवा संभाग में नियम-कानून नाम की कोई चीज़ बची है या सब कुछ “जुगाड़ और जान-पहचान” का खेल बन चुका है?
फर्जी डिग्रियों का खुलासा, फिर भी कार्रवाई नहीं!
यह पहली बार नहीं जब टीपी गुर्दवान विवादों में आए हों। रीवा संभाग आयुक्त बीएस जामोद द्वारा कराई गई जांच में गुर्दवान की AMIE (सिविल) और MA (सोशियोलॉजी) की डिग्रियाँ फर्जी पाई गईं। प्रतिवेदन प्रमुख सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग दीपाली रस्तोगी को भेजा जा चुका है। इतना ही नहीं, अधीक्षण यंत्री अतुल चतुर्वेदी ने 3 माह पूर्व ही गुर्दवान पर कार्रवाई का अभिमत भेज दिया था — लेकिन फाइलें दबा दी गईं। सवाल उठता है: आखिर कौन बचा रहा है गुर्दवान को?
एफआईआर दर्ज हो, नहीं तो जनता समझेगी ‘सब सेट है’
इस वायरल वीडियो से अब कोई संदेह नहीं बचा कि कैसे एक कार्यपालन यंत्री ने न केवल नियमों की धज्जियाँ उड़ाईं, बल्कि खुद उसका खुलासा भी किया। यह सिर्फ एक भ्रष्ट अधिकारी की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम में बैठे उन लोगों की चुप्पी की कहानी है, जो उसे बचा रहे हैं।
अब जनता जानना चाहती है:
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क्या गुर्दवान पर FIR दर्ज होगी?
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क्या उनकी सेवानिवृत्ति से पहले निलंबन और गिरफ्तारी होगी?
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क्या शासन “घोटाले की कबूली” को गंभीरता से लेगा?
अब चुप रहना भी अपराध है
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, पूरे विभाग की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर सवाल है। यदि अब भी कार्रवाई नहीं होती, तो यह संदेश जाएगा कि फर्जी डिग्री, घोटाले, वीडियो कबूलनामे — सब माफ हैं, अगर आपकी पकड़ मजबूत है। अब गेंद रीवा संभाग के कमिश्नर और राज्य शासन के पाले में है।
क्या वे कुछ करेंगे — या फिर एक और घोटाला “फाइलों” में दफन हो जाएगा?













