मऊगंज: सीतापुर में प्रशासन के ‘आश्वासनों का पुलिंदा’ ढेर, मंदिर के पास अतिक्रमण बरकरार

सालों से खबरें प्रकाशित, पर नहीं बदला मंजर; क्या नायब तहसीलदार का 24 घंटे का अल्टीमेटम सिर्फ दिखावा था?

मऊगंज (सीतापुर)। कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता की आवाज अखबारों के माध्यम से शासन तक पहुँचती है, लेकिन मऊगंज जिला अंतर्गत ग्राम पंचायत सीतापुर में सिस्टम ने जैसे अपने कान बंद कर लिए हैं। सीतापुर मंदिर परिसर के पास फैला अतिक्रमण और वहां पसरी गंदगी अब केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता स्मारक बन चुकी है।

सालों से खबरें, पर नतीजा शून्य इस समस्या को लेकर सालों से खबरें प्रकाशित हो रही हैं, ग्रामीण लगातार गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर प्रशासन के पास सिर्फ एक शब्द है— ‘आश्वासन’। गौरतलब है कि दो महीने पहले नायब तहसीलदार ने स्वयं मौके पर पहुँचकर 24 घंटे के भीतर कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिलाया था। लेकिन विडंबना देखिए कि वे ’24 घंटे’ महीनों में तब्दील हो गए, पर हालात जस के तस बने हुए हैं।

धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ मंदिर की सीढ़ियों पर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा और चारों ओर फैली अव्यवस्था ने यहाँ के धार्मिक वातावरण को पूरी तरह दूषित कर दिया है। यह प्राचीन मंदिर अब दुकानों और गंदगी के घेरे में है। ग्रामीणों का आरोप है कि श्रद्धा के केंद्र को कुछ रसूखदारों ने अपनी मनमानी का अड्डा बना लिया है। सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़े दबाव में काम कर रहा है, जो इन अवैध कब्जों पर बुलडोजर चलाने से कतरा रहा है?

प्रशासन से तीखे सवाल: * सालों से मिल रही शिकायतों और मीडिया रिपोर्ट्स पर अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

  • क्या नायब तहसीलदार का 24 घंटे का अल्टीमेटम सिर्फ जनता के गुस्से को शांत करने का एक ‘हथकंडा’ था?

  • क्या शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों को प्रशासन का मूक संरक्षण प्राप्त है?

सीतापुर की जनता अब खोखले आश्वासनों से थक चुकी है। यदि अब भी अतिक्रमण नहीं हटा और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हुए, तो जन-आक्रोश किसी भी समय उग्र रूप ले सकता है। प्रशासन को यह समझना होगा कि कलम की ताकत और जनता का धैर्य अब जवाब दे रहा है।

 

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