MP में 9 साल बाद कर्मचारियों को प्रमोशन की सौगात! मोहन सरकार ने खोला रास्ता, कोर्ट की शर्तों के साथ शुरू होगी प्रक्रिया

भोपाल – मध्य प्रदेश के चार लाख 75 हजार से अधिक कर्मचारियों को अब लंबा इंतज़ार नहीं करना होगा। वर्षों से प्रमोशन की बाट जोह रहे सरकारी कर्मचारी अब राहत की सांस ले सकते हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अगुवाई में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के आधार पर प्रमोशन प्रक्रिया को हरी झंडी दे दी है। यह फैसला राज्य के प्रशासनिक इतिहास में एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है।

9 साल का ठहराव… अब खत्म!
राज्य में कर्मचारियों की पदोन्नति प्रक्रिया वर्ष 2016 से ठप पड़ी थी। इस दौरान करीब 1 लाख से अधिक कर्मचारी रिटायर हो चुके हैं, जिन्हें योग्य होते हुए भी प्रमोशन का लाभ नहीं मिल पाया। वजह थी — प्रमोशन में आरक्षण को लेकर विवाद। 2002 में बनाए गए नियमों में वर्टिकल आरक्षण के चलते केवल आरक्षित वर्ग को पदोन्नति दी गई, जिससे सामान्य वर्ग के कर्मचारी वंचित रह गए। परिणामस्वरूप, मामला अदालत पहुंचा और 9 साल से यह फाइलें सिर्फ सरकारी आलमारियों में धूल खा रही थीं।

अब क्यों आया बदलाव?
मुख्यमंत्री मोहन यादव की सरकार ने इस मुद्दे को प्राथमिकता में लेते हुए सुप्रीम कोर्ट की शर्तों को आधार बनाकर पदोन्नति प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया है। राज्य के पटवारी, शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी और अन्य विभागों के तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को इस पहल का लाभ मिलेगा।

कौन मिलेगा प्रमोशन, कौन नहीं?
तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के महामंत्री उमाशंकर तिवारी के मुताबिक, “पूर्व में जिनकी एक से अधिक बार पदोन्नति हो चुकी है, उन्हें वर्तमान नियमों के तहत दोबारा पदोन्नत नहीं किया जा सकता। वहीं, सीधी भर्ती के पदों पर कार्यरत कुछ आरक्षित वर्ग के कर्मचारी भी इस दायरे में नहीं आएंगे।”

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख
सपाक्स के प्रदेश अध्यक्ष के.एस. तोमर ने कहा कि, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्पष्ट हैं — पदोन्नति में आरक्षण केवल तभी लागू होगा जब ‘क्रीमी लेयर’ को अलग किया जाए। यदि ऐसा नहीं होता, तो यह सुप्रीम कोर्ट की अवमानना मानी जाएगी।”

अब सरकार पर जिम्मेदारी है कि वह इन निर्देशों का पूरी पारदर्शिता और संवैधानिक मर्यादा के भीतर पालन करे। सवाल यह भी है कि क्या यह फैसला सिर्फ ‘फाइलों’ में रह जाएगा या जमीनी स्तर पर बदलाव लाएगा?

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