लाड़ली बहना योजना की 25वीं किस्त पर टकटकी लगाए बहनों की निगाहें, सरकार से भरोसे की अगली परीक्षा

लाड़ली बहना योजना—मध्यप्रदेश की महिलाओं के लिए शुरू की गई एक सामाजिक और आर्थिक क्रांति—अब अपनी 25वीं किस्त की ओर बढ़ रही है। लेकिन इस बार इंतजार थोड़ा लंबा है और सवाल भी बहुत गहरे। बहनों की निगाहें अब सिर्फ बैंक खाते की स्क्रीन पर नहीं, बल्कि सरकार की वादों पर भी टिकी हैं। मध्यप्रदेश की राजनीति में बहनों का स्थान अब सिर्फ मतदाता तक सीमित नहीं है—वे नीति निर्धारण की धुरी बन चुकी हैं। लाड़ली बहना योजना ने दो साल पूरे कर लिए हैं और इसने राज्य की 1.27 करोड़ महिलाओं को हर महीने ₹1250 की सहायता से आर्थिक संबल तो दिया ही है, साथ ही मुख्यमंत्री मोहन यादव की कथनी और करनी की कसौटी भी बन गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस योजना को ‘रक्षाबंधन का संकल्प’ कहा था। लेकिन अब बहनों को इस ‘संकल्प’ की तिथि का भी बेसब्री से इंतजार करना पड़ रहा है। जून की 25वीं किस्त अब तक घोषित नहीं हुई है, और यही असमंजस लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या यह योजना केवल चुनावी मौसम की मिठाई थी या फिर वास्तव में महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता की नींव? इससे पहले अप्रैल और मई की किस्तें 16 अप्रैल और 15 मई को भेजी गई थीं—यानी हर बार वादा थोड़ा आगे सरकता गया। अब 15 जून तक 25वीं किस्त आने की उम्मीद जताई जा रही है, लेकिन सरकार ने अभी तक कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की है। ये चुप्पी कई बहनों के लिए चिंता और संशय की वजह बन गई है। योजना के तहत अब तक ₹35 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि सीधे महिलाओं के खातों में ट्रांसफर की जा चुकी है। यह आंकड़ा बड़ा है, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या योजनाएं केवल आंकड़ों से चलती हैं या भरोसे और समयबद्धता से? सरकार ने बहनों की रसोई के लिए भी राहत देने का दावा किया है। 26 लाख से अधिक महिलाओं को सिलेंडर रिफिलिंग के लिए ₹30.83 करोड़ की सहायता दी गई है और 56 लाख 83 हजार से अधिक बहनों को ₹341 करोड़ की सामाजिक सुरक्षा पेंशन भी मिली है। लेकिन इन प्रयासों के बावजूद, जमीनी स्तर पर सवाल उठ रहे हैं—क्या यह राहत पर्याप्त है या फिर सिर्फ खबरों की हेडलाइन? एक तरफ राज्य सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है, दूसरी ओर गांवों-कस्बों की महिलाएं बैंक पासबुक लेकर चक्कर काट रही हैं। हर तारीख को बदलते वादे महिलाओं के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं। सरकार को यह समझना होगा कि लाड़ली बहना योजना अब महज एक योजना नहीं रही, यह उनके शासन की विश्वसनीयता का प्रतीक बन चुकी है। जून की 25वीं किस्त एक और आर्थिक मदद नहीं, बल्कि सरकार के भरोसे की अगली किस्त है। तारीख चाहे जो हो, लेकिन यदि इस बार भी वादा अधूरा रह गया, तो बहनों का धैर्य ही नहीं, विश्वास भी डगमगा सकता है।

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