
मऊगंज-: देवतालाब विधानसभा के चार बार के विधायक और वर्तमान में मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष गिरीश गौतम पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ रहे हैं—इस बार सड़क को लेकर, जो 18 साल से सिर्फ “आश्वासन” की धूल फांक रही है।ग्राम पंचायत पन्नी पथरिहा पडिंतना टोला की महज 3.50 मीटर की सड़क, जिसे किसी भी आम जनप्रतिनिधि के लिए बनवाना एक सामान्य कार्य होता, वहीं गिरीश गौतम जैसे कद्दावर नेता के लिए 18 साल में भी असंभव साबित हुआ।
आश्वासन की राजनीति या कमीशन का खेल?
स्थानीय सरपंच और जनता ने जब इस सड़क के निर्माण के लिए बार-बार गुहार लगाई, तो हर बार मिला केवल एक जवाब—“चुनाव बाद देखेंगे।” 18 साल, कई बार चुनाव और अनगिनत दौरे… लेकिन सड़क आज भी वहीं की वहीं।जनपद पंचायत सीईओ राम कुशल मिश्रा ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि यह सड़क निर्माण कार्य 12 मार्च 2025 को स्वीकृत कर आरएस विभाग को सौंप दिया गया है। लेकिन यहीं से शुरू होती है असली कहानी—कमीशन का खेल।

3300 बनाम 8800: विकास की दरें भी बदल गईं!
ग्राम पंचायत द्वारा एक मीटर पीसीसी रोड पर 3300 रु. की स्वीकृति होती है, जबकि आरएस विभाग द्वारा इसी कार्य के लिए 8800 रु. प्रति मीटर खर्च किए जाते हैं। यानी सड़क से पहले जेबें भरने की राजनीति। क्या यही वजह है कि एजेंसी बदलने की मांग जनता कर रही है?सरपंच और सीईओ दोनों एक स्वर में कहते हैं—“जब तक विधायक एजेंसी नहीं बदलते, तब तक निर्माण संभव नहीं।” तो क्या विकास भी अब एजेंसी की बोली पर बिकेगा?
वोट के वक्त रोड पर चलकर आते हैं विधायक साहब!
चुनाव आते ही गिरीश गौतम खुद उसी अधूरी सड़क से गुजरते हैं, जहां बरसात में बच्चों तक को स्कूल जाना मुश्किल होता है। लेकिन जैसे ही वोट मिलते हैं, सड़क की फाइलें फिर किसी दराज में कैद हो जाती हैं।
जनता अब पूछ रही है—हमारा क्या कसूर?
पथरिहा पडिंतना टोला की जनता पूछ रही है—क्या हम सिर्फ पोस्टर में दिखने वाले वोटर हैं? क्या हमारा विकास सिर्फ भाषणों में लिखा जाएगा? मोहन सरकार के “विकास” के नारे क्या सिर्फ शहरों तक सीमित हैं?
अब जनता तय करेगी: विकास चाहिए या वादों की दुकान
देवतालाब की यह सड़क अब सिर्फ सीमेंट और गिट्टी की बात नहीं रह गई है। यह भरोसे की बात है। यह उस नेता की साख की बात है जो 18 साल से हर बार जीतता रहा, लेकिन जनता की ज़िंदगी की सबसे जरूरी चीज़—एक सड़क—नहीं बनवा सका।क्या अब भी यह सड़क बनेगी? या फिर 2028 के चुनाव तक यही 3.50 मीटर सड़क एक बार फिर “कमिशन की खाई” में दबकर रह जाएगी?













