मऊगंज में लाड़ली लक्ष्मी योजना का काला सच: बेटी के सपनों पर प्रशासन की लूट और लापरवाही

मऊगंज-मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार भले ही “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” और “लाड़ली लक्ष्मी योजना” जैसी बड़ी-बड़ी बातें कर रही हो, लेकिन जमीनी सच्चाई चौंकाने वाली है — जहां सरकार बेटियों के सपनों को संवारने का दावा करती है, वहीं मऊगंज की धरती पर एक मां की पुकार सिस्टम की लापरवाही और भ्रष्टाचार में दबती जा रही है। शशिकला पटेल, ग्राम फरहदा, तहसील मऊगंज, जिला मऊगंज की निवासी हैं। उन्होंने अपनी बेटी नीलम पटेल का नाम ‘लाड़ली लक्ष्मी योजना’ में जुड़वाया था। योजना के तहत कुल ₹1,18,000 मिलने थे — यह राशि अलग-अलग चरणों में बेटी की शिक्षा के हर पड़ाव पर दी जानी थी। छठवीं कक्षा में प्रवेश पर ₹2,000, नवमी में ₹4,000, ग्यारहवीं व बारहवीं में ₹6,000-₹6,000। लेकिन इन तमाम वादों और सरकारी दावों के बीच सच्चाई ये है कि बेटी को सिर्फ छठवीं क्लास के ₹2000 ही अब तक मिल पाए हैं। बाकी की राशि… गायब! लाड़ली क्रमांक 1232064345 है, लेकिन जब इस योजना की वास्तविकता जानने के लिए शशिकला ने स्थानीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सावित्री पटेल से संपर्क किया, तो उन्हें जो जवाब मिला वो बेहद हैरान करने वाला था। आरोप है कि सावित्री पटेल के पति ने लाड़ली लक्ष्मी योजना का ओरिजिनल प्रमाण पत्र अपने घर में छुपा रखा है, और कहा गया कि “जब तक प्रमाण पत्र नहीं दोगी, पैसा नहीं मिलेगा।” सवाल ये है कि सरकार की योजना का दस्तावेज किसी कर्मचारी के घर कैसे और क्यों रखा गया?इतना ही नहीं, जब महिला बाल विकास परियोजना अधिकारी निर्मला शर्मा से संपर्क करने की कोशिश की गई, तो उनका फोन तक नहीं उठाया गया। बार-बार कॉल करने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। क्या एक जिम्मेदार अधिकारी का यह कर्तव्य नहीं कि अगर वो मीटिंग में हैं तो कम से कम एक मैसेज करके स्थिति स्पष्ट करें? या फिर सच में इस लूट की चुप्पी में उनकी भी हिस्सेदारी है? यह सवाल सिर्फ शशिकला पटेल का नहीं है — यह सवाल है हर उस बेटी का जो सरकार की योजनाओं में दर्ज तो है, लेकिन जमीनी हकीकत में उसका नाम सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह गया है। क्या मोहन यादव सरकार इस लूट की जवाबदेही लेगी? क्या भ्रष्टाचार के इन गढ़ों पर कभी कार्रवाई होगी? या फिर बेटियों के नाम पर बजट बना-बनाकर कागज़ों में ही योजनाएं पूरी होती रहेंगी? बेटियां इंतज़ार कर रही हैं… अब जवाब की बारी सरकार की है।

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