मऊगंज पुलिस अधीक्षक कार्यालय बना दिव्यांगों के लिए पहाड़: न रैंप, न लिफ्ट, न इंसानियत

मऊगंज (म.प्र.) — एक तरफ़ सरकार मंचों से दिव्यांगजनों को सशक्तिकरण के नारे देती है, ‘सुगम्य भारत अभियान’ चलाती है, और दूसरी तरफ जमीनी सच्चाई ये है कि इंसाफ तक पहुंचने के लिए आज भी सीढ़ियां लांघनी पड़ती हैं। और ये सीढ़ियां किसी आम इमारत की नहीं, मऊगंज के एसपी ऑफिस की हैं — जहां कानून और व्यवस्था की ताकत बैठती है, लेकिन वहां तक पहुंच पाना दिव्यांगों के लिए आज भी एक असंभव मिशन है।

 दूसरी मंज़िल पर बसा ‘न्याय’, लेकिन रास्ता केवल ताकतवरों के लिए

मऊगंज पुलिस अधीक्षक कार्यालय एक बहुमंजिला इमारत में दूसरी मंजिल पर स्थित है। सवाल उठता है — क्या न्याय के लिए शारीरिक रूप से सक्षम होना जरूरी है? दिव्यांग और बुजुर्गों को वहां पहुंचने के लिए न तो लिफ्ट है, न रैंप, और न ही कोई व्हीलचेयर सहायता। जो लोग ऊपर तक नहीं पहुंच सकते, वो प्रशासन की नज़रों से ही बाहर हैं। उनके लिए कोई वैकल्पिक संवाद का माध्यम तक उपलब्ध नहीं। क्या ये एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का चेहरा है? या फिर ये सुविधा का दंभ भरने वाला एक क्रूर मज़ाक?

 दिव्यांग पत्रकार की लड़ाई – न सिर्फ अपने लिए, बल्कि समाज के लिए

दिव्यांग पत्रकार दीपक गुप्ता, जो कि Da News Plus और Khabar Bharat 360 से जुड़े हैं, खुद इस व्यवस्था का शिकार बन चुके हैं। उन्होंने खुलकर कहा: “जब भी मैं किसी भ्रष्टाचार या जनहित मुद्दे की रिपोर्टिंग के दौरान एसपी से मिलना चाहता हूं, तो मेरी शारीरिक कमजोरी मुझे वहां तक जाने ही नहीं देती। क्या सच की बात रखने का हक सिर्फ उन्हीं को है जो दौड़ सकते हैं?” दीपक का यह दर्द व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक है। ये आवाज़ उन हजारों दिव्यांगों और वरिष्ठ नागरिकों की है, जो केवल इसलिए चुप रह जाते हैं क्योंकि इमारत की सीढ़ियां उनके हौसले से ऊंची होती हैं।

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प्रशासन की संवेदनहीनता – न हेल्प डेस्क, न संवाद, सिर्फ दीवारें

इस एसपी ऑफिस में नीचे कोई हेल्प डेस्क नहीं, जो बताए कि आपको कहां जाना है, किससे मिलना है, या आपकी शिकायत कैसे दर्ज होगी। कोई नोडल अधिकारी नहीं, जो नीचे आकर बुजुर्गों या दिव्यांगों से संवाद कर सके।
कोई वीडियो कॉल या ऑडियो मीटिंग सिस्टम नहीं, ताकि ऊपर बैठे अफसर नीचे मौजूद जनता से वर्चुअल संवाद कर सकें।

यानी अगर आप सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते, तो आप इस सिस्टम के लिए ‘अदृश्य’ हैं।

 प्रशासनिक अभद्रता या असंवेदनशील रवैया?

सवाल यहां खत्म नहीं होता। दीपक गुप्ता ने बताया कि कई बार आवेदन देने के बावजूद प्रशासन का रवैया टालमटोल वाला रहा है। या तो फाइलें गुम हो जाती हैं, या सुनवाई के नाम पर ‘आओ कल आना’ जैसा उत्तर मिलता है। क्या ये वही प्रशासन है जो हर मंगलवार को ‘जनसुनवाई’ के नाम पर जनता से संवाद का दावा करता है? जनसुनवाई तब कैसी, जब आधी जनता वहां तक पहुंच ही न सके?

 चार ठोस सुझाव – जिन्हें मानना प्रशासन का कर्तव्य है, कोई एहसान नहीं

दीपक गुप्ता ने जो सुझाव रखे हैं, वे बिलकुल व्यावहारिक और संविधानसम्मत हैं:

  1. भूतल पर हेल्प डेस्क की स्थापना

  2. दिव्यांगों और बुजुर्गों के लिए नोडल अधिकारी की तैनाती

  3. वीडियो कॉल/ऑडियो सुनवाई की सुविधा

  4. भविष्य में सभी सरकारी भवनों को दिव्यांग-अनुकूल बनाना अनिवार्य किया जाए

इनमें से एक भी मांग असंभव नहीं, और न ही किसी तरह का विशेषाधिकार है। ये मौलिक अधिकार हैं, जिन्हें देने से इंकार करना सीधा भेदभाव है।

 क्या प्रशासन जागेगा या सिर्फ बयान देगा?

अब इस मुद्दे पर असली सवाल यह है: क्या प्रशासन केवल ‘जांच करेंगे’ जैसा बयान देकर खानापूर्ति करेगा?
या फिर दीपक गुप्ता की इस आवाज़ को एक गंभीर संकेत मानते हुए व्यवस्था में बदलाव लाएगा? क्योंकि यदि एसपी ऑफिस जैसा महत्वपूर्ण संस्थान ही सुगमता के पैमाने पर फेल हो जाए, तो फिर अन्य विभागों से क्या उम्मीद करें? ह खबर एक आवेदन से शुरू होकर व्यवस्था के चरमराते ढांचे की पोल खोलती है। ये सिर्फ दीपक गुप्ता की पीड़ा नहीं, ये पूरे समाज के उस तबके की चुप्पी का प्रतिकार है जिसे सिस्टम ने अब तक नजरअंदाज किया है। क्या वो इस आवाज़ को ‘एक और शिकायत’ समझकर फाइलों में दबा देगा? या फिर पहली बार ‘नीचे उतरकर न्याय’ की शुरुआत करेगा?

“न्याय की इमारत चाहे जितनी ऊंची हो, उसकी नींव जमीन से ही शुरू होती है। और जब तक वह जमीन दिव्यांगों की पहुंच में नहीं होगी — तब तक हर मंजिल अधूरी है।”

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