
मऊगंज | नवगठित जिला मऊगंज एक बार फिर कानून-व्यवस्था और राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर सुर्खियों में है। बराब मोड़ पर आधी रात के बाद जो घटनाक्रम सामने आया, उसने न सिर्फ प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल खड़े किए, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि मऊगंज में जमीन से जुड़े विवाद अब सिर्फ कानूनी नहीं रहे, बल्कि वे खुलकर सियासी अखाड़े का रूप ले चुके हैं। लल्लू पांडे और विनोद खोडबानी के बीच चले आ रहे जमीन विवाद में उस समय नया मोड़ आ गया, जब भाजपा विधायक प्रदीप पटेल स्वयं नेशनल हाईवे-135 पर रात करीब 9 बजे धरने पर बैठ गए। हैरानी की बात यह रही कि प्रदेश में भाजपा की सरकार है, जिले में प्रशासन भाजपा शासन के अधीन है, फिर भी एक सत्तारूढ़ दल के विधायक को सड़क पर धरना देना पड़ा।
विधायक के धरने ने इस सवाल को जन्म दे दिया कि क्या उन्हें अपनी ही सरकार के प्रशासन और पुलिस की कार्यप्रणाली पर भरोसा नहीं था, या फिर यह एक पक्ष को लाभ पहुंचाने का दबाव बनाने की कोशिश थी। धरने के दौरान हालात उस समय और बिगड़ गए जब मौके पर जुटी भीड़ विधायक के खिलाफ नारेबाजी करने लगी। “मुर्दाबाद” के गूंजते नारों ने यह संकेत दे दिया कि मऊगंज की जनता अब राजनीतिक दबाव में लिए जा रहे फैसलों को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। नेशनल हाईवे पर तनावपूर्ण माहौल, उग्र भीड़ और आत्मदाह जैसी चेतावनियों ने स्थिति को विस्फोटक बना दिया, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में रही।
जिस तरह विधायक को सुरक्षा घेरे में वहां से निकालना पड़ा, उसने मऊगंज पुलिस की तैयारियों की पोल खोल दी। यदि समय रहते स्थिति को नियंत्रित नहीं किया जाता, तो कोई भी बड़ी अप्रिय घटना घट सकती थी। यह गंभीर चूक मानी जा रही है कि एक जनप्रतिनिधि स्वयं असुरक्षित महसूस करे और पुलिस हालात संभालने में संघर्ष करती नजर आए। इस घटनाक्रम के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। विपक्ष को सरकार पर हमला करने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि जब विधायक स्वयं जमीन विवादों में पंच बनकर उतरेंगे, तो न्यायालय और तहसील प्रशासन की भूमिका क्या रह जाएगी।
विपक्ष ने इसे सत्ता का दुरुपयोग करार देते हुए आरोप लगाया कि मऊगंज में कानून के बजाय व्यक्तिगत प्रभाव और राजनीतिक रसूख के आधार पर फैसले कराए जा रहे हैं। एक ओर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव प्रदेश में सुशासन और कानून के राज की बात करते हैं, वहीं मऊगंज में उनके ही दल के विधायक का इस तरह विवादों में आना सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाता दिख रहा है। प्रशासनिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि यदि जनप्रतिनिधि खुलेआम न्यायिक और राजस्व प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करेंगे, तो अधिकारी निष्पक्ष होकर काम कैसे कर पाएंगे।
यह मामला अब सिर्फ दो व्यक्तियों के बीच जमीन के स्वामित्व का नहीं रह गया है। यह मऊगंज की प्रशासनिक निष्पक्षता, पुलिस की भूमिका और भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन चुका है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या विधायक वास्तव में शांति स्थापित करने गए थे या फिर पुलिस की कार्रवाई को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। क्या मऊगंज में न्याय अब सड़कों पर जुटी भीड़ और राजनीतिक दबाव के आधार पर तय होगा, या फिर कानून अपने तय रास्ते पर चलेगा।
बराब मोड़ की यह घटना प्रशासन और जनप्रतिनिधियों दोनों के लिए एक चेतावनी है। प्रशासन को चाहिए कि वह बिना किसी राजनीतिक दबाव के जमीन के पट्टों, दस्तावेजों और मालिकाना हक की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराए। वहीं जनप्रतिनिधियों को भी यह समझना होगा कि जनता अब जागरूक है और हर कदम पर नजर रख रही है। किसी भी विधायक के खिलाफ लगे “मुर्दाबाद” के नारे आत्ममंथन की मांग करते हैं। मऊगंज की जनता अब सिर्फ बयान नहीं, बल्कि न्याय और सुशासन चाहती है।













