
मऊगंज, मध्य प्रदेश। जिले में सत्तारूढ़ पार्टी के नेता चाहे आपस में जितना भी तालमेल बना लें या बिगाड़ लें, लेकिन जब बात दिव्यांगों की आती है, तो सबकी ज़ुबान बंद और आंखें मूंद जाती हैं। हालत ये है कि मऊगंज में दिव्यांगों को अपने हक के लिए कलेक्ट्रेट की सीढ़ियां चढ़नी पड़ रही हैं, और कई बार तो खुद अपनी ही आवाज़ बनकर सिस्टम से भीख मांगनी पड़ रही है। ज़मीनी हकीकत यह है कि मऊगंज जिले में दिव्यांगों की स्थिति किसी बस्तर से भी बदतर हो चुकी है। ग्राम पंचायतों से लेकर जनपद तक कोई सुनवाई नहीं है। योजनाएं केवल कागज़ों में सजी हैं, और हकीकत में दिव्यांगों को ₹600 की नाममात्र पेंशन थमा दी जाती है — जिसमें न दवा मिलती है, न सहारा। पंचायतों में दिव्यांगों के नाम पर कोई योजना क्रियान्वित नहीं हो रही, जिससे यह साफ हो जाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं।मंगलवार को जनसुनवाई में एक ऐसी ही बेबसी की कहानी सामने आई। मऊगंज कस्बे के निवासी दिव्यांग रियाज अहमद अंसारी, जो चलने-फिरने में असमर्थ हैं,

कलेक्टर के पास पहुंचे और ट्राई साइकिल की मांग की। उनका दिव्यांग प्रमाणपत्र बना हुआ था, लेकिन पोर्टल पर अपलोड न होने के कारण उन्हें किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा था। रियाज की बात सुनकर कलेक्टर श्री जैन ने तुरंत संबंधित विभाग को निर्देश दिए कि रिकॉर्ड को पोर्टल पर अपलोड किया जाए और योजना का लाभ तत्काल दिलाया जाए। जनसुनवाई के दौरान ही रियाज का रिकॉर्ड ऑनलाइन अपडेट कर दिया गया और अब उन्हें ट्राई साइकिल मिलने का रास्ता साफ हो गया है। सवाल यह उठता है कि जब एक दिव्यांग को अपनी जरूरत के लिए खुद लड़ना पड़ता है, तो बाकी उन सैकड़ों दिव्यांगों की हालत क्या होगी जिनकी आवाज़ किसी जनसुनवाई तक नहीं पहुंचती? मऊगंज जिले का प्रशासन और राजनीति दोनों को जवाब देना होगा – क्या वाकई ‘सर्वजन हिताय’ की योजनाएं सिर्फ भाषणों तक सिमट चुकी हैं?













