
नई दिल्ली- मध्यप्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री विजय शाह द्वारा कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर की गई विवादित टिप्पणी पर देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। न्याय के मंदिर से उठी ये आवाज न सिर्फ संविधान के सम्मान की पैरोकारी करती है, बल्कि सत्ता के गलियारों में बैठे उन लोगों को भी आइना दिखाती है जो शब्दों की मर्यादा को राजनीति की भट्टी में झोंक देते हैं। सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस दीपांकर दत्ता शामिल हैं, ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि मामले का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। अदालत ने यह बात उस वक्त कही जब एक याचिकाकर्ता की ओर से लगातार इसे एक राजनीतिक रंग देने की कोशिश की जा रही थी। कोर्ट ने दो टूक कहा – “यह न्याय की प्रक्रिया है, इसे राजनीतिक मंच मत बनाइए।” सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि मामले की जांच के लिए गठित SIT ने घटनास्थल का दौरा किया है, मोबाइल फोन व वीडियो जब्त किए गए हैं और जांच प्रगति पर है। सुप्रीम कोर्ट ने SIT को और समय देने का निर्देश देते हुए यह स्पष्ट किया कि जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि विजय शाह की गिरफ्तारी पर अंतरिम संरक्षण जारी रहेगा, लेकिन इसके साथ ही हाईकोर्ट में चल रही समानांतर कार्रवाई को खत्म कर दिया गया। अदालत ने यह भी कहा कि एक ही मुद्दे पर दो अलग-अलग स्तर पर सुनवाई न्यायिक प्रक्रिया को भ्रमित करती है।सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब कोर्ट ने विजय शाह के बयान पर सख्त टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने मंत्री को याद दिलाया कि वे एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं और ऐसे में उन्हें अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए, खासकर ऐसे संवेदनशील मामलों में। जब विजय शाह की ओर से कहा गया कि उनके बयान को गलत तरीके से समझा गया है और वे इसके लिए खेद भी जता चुके हैं, तब भी कोर्ट ने नरमी नहीं दिखाई। कोर्ट की यह चेतावनी सत्ता के उन तमाम प्रतिनिधियों के लिए एक सख्त संदेश है जो जुबान से संवैधानिक गरिमा को ठेस पहुंचाने का दुस्साहस करते हैं। इस बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त SIT की जांच भी जारी है। इस जांच टीम का नेतृत्व सागर ज़ोन के DIG प्रमोद वर्मा कर रहे हैं, जिनके साथ SSB के DIG कल्याण चक्रवर्ती और डिंडोरी की पुलिस अधीक्षक वाहिनी सिंह सदस्य के तौर पर जुड़ी हैं। SIT ने अपनी जांच रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सीलबंद लिफाफे में सौंपी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कोर्ट इस पूरे मामले को बेहद गंभीरता से देख रही है। गौरतलब है कि पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने FIR पर रोक लगाने से इंकार करते हुए यह साफ कर दिया था कि कानून सभी के लिए एक जैसा है — चाहे वह आम नागरिक हो या कोई मंत्री। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि भारतीय न्यायपालिका सत्ता से नहीं डरती, बल्कि उसकी जवाबदेही तय करती है। और सबसे अहम बात — शब्दों की कीमत होती है, खासकर तब, जब आप सत्ता की कुर्सी पर बैठे हों। विजय शाह की जुबान पर सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार न सिर्फ उन्हें, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र को एक चेतावनी है — “संवैधानिक पद है, तो संवैधानिक व्यवहार भी कीजिए।”













