
मऊगंज जनपद पंचायत की सेमरिया कुंज बिहारी ग्राम पंचायत में पंचायत सचिव पर गंभीर आरोप लगाते हुए ग्राम घेलौही निवासी बुद्धसेन साकेत ने भ्रष्टाचार और दबंगई की पूरी कहानी सार्वजनिक की है। बुद्धसेन साकेत का कहना है कि उनका खाता स्टेट बैंक में है, लेकिन उनकी जानकारी और सहमति के बिना ही पंचायत सचिव उमेश द्विवेदी पिता रामयास द्विवेदी द्वारा मनरेगा की मजदूरी की राशि खाते में जमा कराई जाती है। आरोप यह भी है कि सचिव ने अपने कथित दलालों के माध्यम से पीड़ित पर दबाव बनाया कि खाते में जमा मजदूरी की राशि निकालकर उन्हें सौंप दी जाए। पीड़ित ने बताया कि यह खेल लंबे समय से चल रहा है। एक माह पूर्व ही सचिव के दबंगों और दलालों ने उनके खाते से जबरदस्ती ₹3000 निकलवा लिए। इतना ही नहीं, हाल ही में उन्हें ₹1500 की राशि भी निकालकर देनी पड़ी।
बुद्धसेन साकेत ने पुलिस को बताया कि 10 सितंबर 2025 की दोपहर करीब 1:50 बजे जब वे मजदूरी कर लौट रहे थे और अपनी मोटरसाइकिल से घर की ओर आ रहे थे, तभी सचिव के कुछ गुंडों ने रास्ते में रोक लिया। उनकी मोटरसाइकिल की चाबी छीन ली और धमकी देते हुए कहा कि चाबी नहीं लौटाएंगे। काफी समझाने-बुझाने और प्रयास के बाद ही चाबी उन्हें वापस मिली। इस दौरान उन्हें गालियां दी गईं और मां-बहन तक को अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया गया। पीड़ित ने थक-हारकर लौर थाना पहुंचकर इसकी लिखित शिकायत दर्ज कराई। लौर पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच का आश्वासन दिया है।इस पूरे मामले ने पंचायत व्यवस्था और मनरेगा जैसी योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि जब सचिव जैसे जिम्मेदार पद पर बैठे लोग ही भ्रष्टाचार और दबंगई में लिप्त पाए जाते हैं, तो यह समझना मुश्किल नहीं है कि गरीब मजदूरों के साथ किस तरह का अन्याय हो रहा है। मजदूरों को असल में काम तक नहीं मिलता और उनके नाम से पैसा खातों में डालकर फिर उसे दबाव बनाकर निकलवाया जाता है। यह प्रकरण न केवल एक व्यक्ति की परेशानी है, बल्कि पूरे पंचायत स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार की परतें खोलता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच हो, तो कई और सचिवों और दलालों की मिलीभगत सामने आ सकती है।अब देखना होगा कि लौर पुलिस और जिला प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेते हैं और दोषियों पर कब तक सख्त कार्रवाई करते हैं। यदि कार्रवाई नहीं हुई तो यह मामला ग्रामीणों के बीच आक्रोश को और बढ़ा सकता है, जिससे जनपद पंचायत की साख पर भी बुरा असर पड़ेगा।













