
रीवा। जिले के योजना एवं सांख्यिकी विभाग में प्रतिनियुक्ति को लेकर बड़ा घपला सामने आया है। जहां एक ओर नियमों की दुहाई देकर एक कर्मचारी को मूल विभाग भेज दिया गया, वहीं दूसरी ओर नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए दूसरे कर्मचारी को बिना वेतन अभयदान देकर विभाग में बनाए रखा गया है। मामला योजना एवं सांख्यिकी विभाग के सीईओ अनिल दुबे से जुड़ा है, जिन पर दोहरे मापदंड अपनाने के गंभीर आरोप लगे हैं। जानकारी के मुताबिक, जिले में पहले विंध्य विकास प्राधिकरण कार्यरत था जिसे अब योजना एवं सांख्यिकी विभाग में विलय कर दिया गया है। लेकिन विलय के बाद जो सबसे बड़ी अनदेखी हुई, वह कर्मचारियों के वेतन और भत्तों को लेकर है। विभाग को तो नए ढांचे में समाहित कर लिया गया लेकिन वहां कार्यरत कर्मचारियों को पूरी तरह भुला दिया गया। नतीजा यह हुआ कि जिन लोगों ने सालों से सेवा दी, उन्हें बिना वेतन व सुविधा के जीने पर मजबूर होना पड़ा। मामले में और गहराई में जाएं तो साफ होता है कि प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत दो कर्मचारियों के साथ भिन्न व्यवहार किया गया। आदिम जाति कल्याण विभाग के जलवाहक राजेंद्र प्रसाद कुशवाहा, जिन्हें वर्ष 2011 में विंध्य विकास प्राधिकरण में प्रतिनियुक्त किया गया था, उनकी प्रतिनियुक्ति को निरस्त कर मूल विभाग भेज दिया गया। वहीं राजेश कोल, जो जिला शिक्षा अधिकारी, सीधी कार्यालय से 2011 में प्रतिनियुक्त पर आए लेखपाल हैं, उन्हें अब तक योजना एवं सांख्यिकी विभाग में बनाए रखा गया है — वह भी बिना वेतन। अब बड़ा सवाल ये उठता है कि एक ही तरह की नियुक्ति, एक ही विभाग, लेकिन दो तरह का फैसला? आखिर किस आधार पर एक को नियम दिखाकर विदाई दी गई और दूसरे को ‘विशेष छूट’? सीईओ अनिल दुबे से जब इस पक्ष पर बातचीत की गई, तो उनका कहना था कि “प्रतिनियुक्ति को समाप्त करना मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह निर्णय कलेक्टर व कमिश्नर स्तर पर लिया जाता है।” सवाल ये है कि जब एक कर्मचारी को नियमों के नाम पर भेजा जा सकता है तो दूसरे को क्यों बख्शा गया? मामले की जड़ें गहरी हैं। 30 जनवरी 2020 को योजना, आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग के अपर मुख्य सचिव मोहम्मद सुलेमान ने जबलपुर, सागर व रीवा के सीईओ को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि बिना स्वीकृत प्रतिनियुक्ति वाले कर्मचारियों को मूल विभाग वापस भेजा जाए। परंतु आदेश को ताक पर रख दिया गया और आज तक कुछ कर्मचारियों को “प्रशासनिक छाया” में रखा गया है। अब सवाल ये भी उठता है कि जब राजेश कोल को वेतन नहीं मिल रहा, फिर वो कैसे रोज़मर्रा का खर्च चला रहे हैं? आखिर कौन है जो इस प्रतिनियुक्ति के पीछे पर्दे से संरक्षण दे रहा है? विभागीय मोह या निजी संबंध – सवाल कई हैं, लेकिन जवाब कहीं नहीं। रीवा जिले में यह मामला अब चर्चाओं का केंद्र बन चुका है। कर्मचारी परेशान हैं, अधिकारी मौन हैं और नियमों की पालना केवल दिखावे तक सीमित रह गई है।













