
निवाड़ी जिले में बढ़ती सर्दी के बीच कलेक्टर जमुना भिडे ने बीती रात मानवीय पहल की मिसाल पेश की। ठंड से कांपते लोगों की पीड़ा को समझते हुए वे रात 9 बजे ओरछा नगर की तंग गलियों, बेतवा नदी किनारे बसे इलाकों और मंदिर परिसर में रहने वाले जरूरतमंदों के बीच पहुंचीं। उनके हाथों में न कोई औपचारिक फाइल थी और न ही कोई मंच, बल्कि एक सच्ची संवेदना थी। वे जहां-जहां गईं, वहां लोगों को अपनी उपस्थिति का एहसास नहीं, बल्कि राहत का स्पर्श मिला।
सबसे पहले कलेक्टर भिडे ने मंदिरों के आसपास खुले में ठंड से जूझ रहे बुजुर्गों को देखा। कई बुजुर्ग जमीन पर ठंड से ठिठुरते हुए मिले। कलेक्टर ने बिना देर किए खुद आगे बढ़कर उनके कंधों पर कंबल रखे। जैसे ही कंबल ओढ़ाया गया, बुजुर्गों की आंखों में राहत की चमक दिखाई दी। यह दृश्य देखकर आसपास मौजूद लोगों ने भी राहत की सांस ली कि प्रशासन पहली बार इतनी नजदीकी से उनके बीच आया है।
इसके बाद कलेक्टर का कारवां गंज मोहल्ले की ओर बढ़ा। यहां छोटे-छोटे बच्चों को बिना गर्म कपड़ों के कांपते हुए देख उनका दिल पसीज गया। उन्होंने अधिकारियों को तुरंत निर्देश दिए कि सभी बच्चों के लिए गर्म टोपी, जैकेट और कपड़ों की व्यवस्था की जाए। थोड़ी ही देर में बच्चों को गर्म कपड़े और ऊनी टोपी वितरित की गईं। कलेक्टर ने हर बच्चे से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की और ठंड से बचने के तरीके बताए। बच्चों के चेहरे पर छा गई मुस्कान इस पूरी पहल का सबसे खुशनुमा पल था।
रात आगे बढ़ती रही और कलेक्टर की यात्रा भी। नगर के अलग-अलग हिस्सों में खुले में सो रहे बेघर लोगों के पास वे खुद पहुंचीं। कई लोग फुटपाथ पर या मंदिर की सीढ़ियों पर बिना किसी सुरक्षा के लेटे मिले। कलेक्टर ने उन्हें जगाकर कंबल ओढ़ाए और पूछा— “कहां से आए हो? कब से यहां रह रहे हो? खाना और पानी मिल पाता है या नहीं?” उनकी यह बातचीत सिर्फ पूछताछ नहीं बल्कि राहत और समाधान का प्रयास थी।
रात लगभग 11.30 बजे ओरछा के एक गरीब व्यक्ति हरिराम कलेक्टर के सामने आया। वह भावुक हो गया और रोते हुए बोला— “मैडम, पेंशन नहीं मिलती… कोई मदद नहीं मिलती… कैसे जिऊं?” कलेक्टर ने उसकी बात शांतिपूर्वक सुनी और वहीं मौजूद अधिकारियों ने उसका नाम लिखकर तत्काल मदद का भरोसा दिया। उसकी आंखों में आशा की जो चमक उभरी, वह प्रशासन की संवेदनशीलता की असली तस्वीर थी।
इस दौरान कई महिलाओं ने भी कलेक्टर को वास्तविक स्थिति बताई। उन्होंने कहा कि उन्हें 600 रुपये की पेंशन और कंट्रोल का राशन मिलता है, पर कई बार समय पर सहायता नहीं मिल पाती। कलेक्टर ने इन सभी मुद्दों को गंभीरता से सुना और समाधान का आश्वासन दिया।
इस मानवीय सफर में तहसीलदार सुनील वाल्मीकि और अन्य प्रशासनिक अधिकारी लगातार साथ रहे। टीम उन संकरी गलियों तक पहुंची जहां शायद ही कभी कोई अधिकारी कदम रखता हो। रात 12 बजे तक कंबल वितरण का यह अभियान चलता रहा। ठंड की रात में कलेक्टर जमुना भिडे न सिर्फ कंबल ओढ़ाती रहीं, बल्कि लोगों के चेहरों पर भरोसे की गर्माहट भी छोड़ गईं।













